J&K: सार्वजनिक रोजगार में 100 फीसदी डोमिसाइल आरक्षण पर सुनवाई से SC का इनकार

नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर में सार्वजनिक रोजगार में 100 फीसदी डोमिसाइल आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई से इनकार कर दिया. जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने याचिकाकर्ता को जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट जाने की सलाह दी. दरअसल, लद्दाख के वकील नजमुल हुदा ने जम्मू और कश्मीर सिविल सेवा एक्ट, 2020 के तहत धारा 3A, 5A, 6, 7 और 8 को चुनौती दी थी.

याचिका में इस एक्ट को संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19 और 21 का उल्लंघन बताया गया था. याचिकाकर्ता ने कहा था कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद से केंद्र शासित प्रदेश समान रूप से सभी कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अधीन है जो देश के बाकी हिस्सों में लागू होते हैं, इसलिए यदि केंद्र शासित प्रदेश में कोई भी आरक्षण निवास के आधार पर दिया जाना है, तो संविधान के अनुच्छेद 16 (3) के अनुरूप ही दिया जा सकता है.

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याचिका में ये भी कहा गया था कि अनुच्छेद 16 में आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए. अधिवास या निवास के आधार पर 100 फीसदी आरक्षण कानून का अस्पष्ट उल्लंघन है क्योंकि यह अनुच्छेद 16 (1) और 16 (2) में निहित समान अवसर की गारंटी को पूरी तरह से निरर्थक और भ्रमपूर्ण बना देगा. सुप्रीम कोर्ट ने ये कई बार दोहराया है. यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 16 में चिंतन किया गया आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए. 

इसलिए जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के अधिवास के लिए 100 फीसदी आरक्षण सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है. इस एक्ट की धारा 5 ए में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी पद पर नियुक्ति के लिए तब तक योग्य नहीं होगा, जब तक वह केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का अधिवास नहीं होगा. अनुच्छेद 16 या 16 (3) के समान अवसर की गारंटी प्रदान करेगा, ये अर्थहीन और भ्रम वाली है. 

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