DNA ANALYSIS: राहत पैकेज पर वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने ZEE NEWS से की खास बातचीत

नई दिल्ली: 21 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज पर वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने ZEE NEWS से खास बातचीत की. उन्होंने बताया कि 21 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज से भारत कैसे आत्मनिर्भर बन पाएगा! ZEE NEWS ने अनुराग ठाकुर से पूछा कि 21 लाख करोड़ रुपए के इकोनॉमिक पैकेज को लेकर सबसे बड़ा विरोध जो सरकार को झेलना पड़ रहा है वो है कि असल में सरकार सिर्फ 1-2 लाख करोड़ रुपये ही खर्च करेगी, जबकि बाकी की रकम सॉफ्ट लोन के तौर पर छोटे व्यापारियों और अन्य लोगों को देगी. यानी ये पैकेज जीडीपी का 10% नहीं बल्कि 1% से भी कम का है. अनुराग ठाकुर ने ZEE NEWS के ऐसे तमाम सवालों के जवाब दिए, जिन्हें आप इस वीडियो में देख सकते हैं. 

DNA VIDEO: अनुराग ठाकुर से खास बातचीत

ZEE NEWS ने अनुराग से पूछा कि राहत पैकेज पर सरकार के कदम से क्या जरूरतमंद लोगों के हाथों में पैसे पहुंच रहे हैं? और अगर पहुंचे हैं तो हमें आज भी सड़कों पर हजारों गरीब और मजदूर अपने घर की ओर लौटते क्यों दिख रहे हैं. एक आंकड़े के मुताबिक पिछले 2 महीनों में 200 से ज्यादा मजदूरों की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई और करीब 900 लोग घायल हो गए. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

तीसरा सवाल ये है कि क्या एक समाज के रूप में हम फेल हो गए? मजदूरों की बनाई इमारतों से बसने वाले बड़े शहर क्यों इन गरीबों को एक छत और 2 वक़्त की रोटी का भरोसा नहीं दे पाए? क्यों आज भी उन्हें घर का सुकून, गांव की वो टूटी सड़कें और मिट्टी की बनी झोपड़ी ही दे पाती है, हमारे ये विकसित कहे जाने वाले शहर नहीं?

चौथा सवाल ये है कि सोशल मीडिया पर इस आर्थिक पैकेज का मजाक भी बहुत उड़ा और शेयर बाजार ने भी इसका स्वागत नहीं किया. 21 लाख करोड़ की मदद का भरोसा देने के बावजूद 18 मई को सेंसेक्स बढ़ने की जगह 1000 पॉइंट्स गिर गया. कुछ लोगों ने इस रकम में लगने वाले जीरो को लेकर मीम्स बनाए तो कई ने इसे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया. इन सबके बावजूद, प्रधानमंत्री जी के ”आत्मनिर्भर” बनने के मंत्र को लोगों ने सराहा और कई ने तो विदेशी कंपनियों को भारतीय नाम भी सुझा दिए. लेकिन आगे क्या?

पांचवा सवाल ये है कि जहां पहले हम पीपीई किट्स और N95 मास्क बनाने में कहीं नहीं थे, वहीं आज भारत में हर रोज 3 लाख से ज्यादा पीपीई किट्स और N95 मास्क बन रहे हैं. ऐसा ही कुछ दवाओं को लेकर भी है, चाहें बात मलेरिया की दवा के इस्तेमाल करने की हो या टीवी के वैक्सीन पर स्टडी, यानी हमारे पास क्षमता और योग्यता दोनों है. तो क्या हम ये कह सकते हैं कि भारत अगर इसी तरह आत्मनिर्भर बनने की राह पर चला तो भारत चीन की जगह दुनिया में इस इंडस्ट्री में अपनी मजबूत दावेदारी दिखाएगा?

छठवां सवाल ये है कि चीन हर साल भारत की कुल अर्थव्यवस्था के बराबर का समान दुनिया भर में बेचता है यानी चीन का कुल निर्यात भारत की पूरी अर्थव्यवस्था के बराबर है. ऐसे में चीन से टकराना कितनी बड़ी चुनौती है और क्या कोरोना के इस काल में भारत अपनी सूझबूझ से कोई बड़ा बदलाव ला पाएगा या चीन से विदेशी कंपनियों को भारत लाने वाली बात सिर्फ एक चुनावी वादा बन के रह जाएगी?

सातवां सवाल ये है कि जान और जहान को बैलेंस करने में सरकार कितनी तैयार है और आने वाले दिनों में इससे जुड़े और क्या कदम आप उठा सकते हैं? अभी की स्थितियां ऐसी हैं कि जहां आज भारत में कोरोना के एक दिन में सबसे ज्यादा 6977 नए मामले आए हैं, भारत ईरान को पीछे छोड़ कोरोना केस के मामले में अब दसवें स्थान पर पहुंच गया है तो वहीं दूसरी ओर भारत की जीडीपी यानी विकास दर का अनुमान लगातार कम होता जा रहा है. IMF का ताजा अनुमान कहता है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 2020-21 में सिर्फ 1.9% रहेगी जबकि कुछ एजेंसीज अब रेशेसन यानी आर्थिक मंदी की बात भी करने लगी हैं.

सवाल ये भी है कि बेरोजगारी का संकट भारत में पहले ही लोगों को परेशान कर रहा था और अब ये और भी गहरा हो गया है. एक निजी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब तक 2.5 करोड़ नौकरियां लॉकडाउन के दौरान जा चुकी हैं और इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं पर देखने को मिलेगा. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक गांवों में इस समय करीब 8 करोड़ नौकरियों की जरूरत है और सिर्फ मनरेगा जैसी स्कीम स्थायी तौर पर इस समस्या को हल करने में समर्थ नहीं होगी. आर्थिक मदद के रूप में जो एलोकेशन इस स्कीम में बढ़ाया भी गया है वो भी सिर्फ 10-15% अतिरिक्त लोगों को काम दिला पाएगा जो अपने आप में चिंता का विषय है. 

पैकेज को लेकर भी लोगों के मन में कई सवाल हैं. जहां कुछ लोग इसे कम बता रहें हैं तो कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे बैंकों में NPA की समस्या और बढ़ेगी. पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने एक लेख में इस बात कि तरफ इशारा किया है कि सरकार और RBI की मदद के बावजूद, बैंक कर्ज देने में डर रहे हैं और 25 मार्च तक जहां बैंकों ने करीब 104 लाख करोड़ रुपए का कर्ज दिया था, वो अब बढ़ने की जगह घट कर 102 लाख करोड़ रुपए रह गया है. उन्होंने ये भी कहा कि भारत के करीब 5.8 करोड़ छोटे व्यापारों को इस सुविधा का फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि वो सरकार द्वारा दी गई MSME की परिभाषा में शामिल नहीं हैं.

सवाल ये भी हैं कि बढ़ता वित्तीय घाटा भी सरकार के लिए समस्या की एक बड़ी वजह बन सकता है. एक अनुमान के मुताबिक पिछले बजट को देखते हुए, अपनी योजनाओं को पूरा करने में सरकार को करीब 8 लाख करोड़ रुपए के कर्ज की जरूरत थी, ये आंकड़ा अब बढ़ कर 12 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. इसकी वजह से इस वर्ष वित्तीय घाटा 3.5% से बढ़कर 5.3% तक पहुंच सकता है और आने वाले समय में इसकी वजह से सरकार पर खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ जाएगा.

सवाल ये भी है कि विपक्षी दल सरकार पर ये आरोप भी लगा रहे हैं कि लोगों के हाथ में पैसे पहुंचाने की जगह सरकार उन्हें कर्ज में डुबाना चाहती है जिससे आने वाले दिनों में उनकी आर्थिक हालत सुधरने की जगह और बुरी हो जाएगी. चाहें बात RBI द्वारा दिए गए  Moratorium या EMI में छूट की हो या व्यापारियों को दिए जाने वाले 3 लाख करोड़ रुपए की कोलेटरल फ्री लोन की. सभी से आने वाले समय में उनपर कर्ज का भार बढ़ेगा. इस समस्या से निपटने के लिए सरकार का लॉन्ग टर्म विजन क्या है? और क्या लोगों के हाथ में पैसे पहुंचाने का एकमात्र रास्ता ज़्यादा कर्ज ही है?

[source_ZEE NEWS]
%d bloggers like this: