DNA ANALYSIS: जब चीन ने छात्रों पर चढ़ा दिए थे टैंक

नई दिल्ली : शुक्र मनाइए कि आप भारत में रहते हैं. इसकी कई वजह हैं, लेकिन इनमें सबसे बड़ी वजह ये है कि भारत में लोकतंत्र है. हो सकता है कि आप दिन भर अपने देश को बुरा-भला कहते हों, और कई बार चीन जैसे देश से भारत की तुलना भी करते हों, लेकिन ऐसा करने वाले सभी लोगों को यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि लोकतंत्र के सिग्नल चीन में उपलब्ध नहीं हैं. और जब भी चीन में लोकतंत्र की आवाज उठी, उस आवाज को वहां की सरकार ने बुरी तरह से कुचल दिया. फिर चाहे इसके लिए निर्दोष लोगों की हत्या ही क्यों न करनी पड़े. 31 वर्ष पहले 4 जून 1989 को चीन के तियनेनमेन स्क्वायर (Tiananmen Square) पर प्रदर्शन कर रहे हजारों छात्रों का सामूहिक नरसंहार कर दिया गया था. यह एक ऐसी घटना थी जिसे चीन की कम्युनिस्ट सरकार लोगों के दिल और दिमाग से मिटाना तो चाहती है, लेकिन उसे आज भी 1989 की यादें सताती हैं क्योंकि तब चीन के लोग अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे. कोरोना वायरस को लेकर चीन पूरी दुनिया का विरोध झेल रहा है. वह हॉन्ग कॉन्ग की आवाज दबाना चाहता है और सीमाओं पर अपने पड़ोसियों को भी धमका रहा है. यह ऐसा दौर है जब चीन की एक गलती उसे पूरी दुनिया में अलग-थलग कर सकती है. चीन का दमनकारी चेहरा पहले भी दिख चुका है. 

अस्सी के दशक में चीन में लोगों का गुस्सा चरम पर था. लोग चीन में लोकतंत्र की स्थापना के लिए जगह-जगह विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. इस विरोध प्रदर्शन का केंद्र थी चीन की राजधानी बीजिंग. इस विरोध प्रदर्शन में कॉलेज और विश्वविद्यालयों के छात्र सबसे बड़ी संख्या में शामिल थे. उस दौरान ची न की सरकार ने मार्शल लॉ लागू कर दिया था. जब कहीं मार्शल लॉ लागू किया जाता है तो उस इलाके का नियंत्रण सेना अपने हाथ में ले लेती है और स्थानीय कानून और सिस्टम निष्क्रिय हो जाते हैं.

मार्शल लॉ लागू होने के बाद बड़ी संख्या में छात्रों की गिरफ्तारियां शुरू हुईं. सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए बीजिंग में सेना उतार दी थी. सेना को सरकार का साफ आदेश था, कि हर हाल में आंदोलन को कुचल देना है. इस पूरे आंदोलन की एक तस्वीर पूरी दुनिया में छा गई थी. यह एक छात्र की तस्वीर थी, जो एक झोला लेकर, एक टैंक के सामने खड़ा हो गया था. इस व्यक्ति को पूरी दुनिया में Tank Man के नाम से जाना गया. लेकिन प्रदर्शनकारियों की तमाम कोशिशें विफल रहीं और चीन की सरकार ने इस आंदोलन का पूरी तरह से दमन कर दिया. हजारों प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई. इस सामूहिक नरसंहार में कितने लोग मारे गए, इसका कोई सटीक आंकड़ा चीन की सरकार ने कभी जारी नहीं किया, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान करीब 3 हजार लोगों की हत्या हुई थी और कुछ विशेषज्ञों का तो अनुमान है कि इसमें करीब 10 हजार लोग मारे गए थे. 

चीन ने उस समय करीब 50 हजार से एक लाख प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए 3 लाख सैनिक सड़कों पर उतार दिए थे. जबकि 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत के 5 लाख सैनिकों ने हिस्सा लिया था और दुश्मनों की संख्या करीब 4 लाख थी. यानी चीन की सेना ने इस आंदोलन को युद्ध स्तर पर कुचल दिया था. तियनेनमेन स्क्वायर आकार में सिर्फ आधा वर्ग किलोमीटर है, लेकिन चीन ने इतने छोटे से इलाको को भी एक युद्ध भूमि में बदल दिया था.

इस नरंसहार की बात करने पर आज भी चीन में प्रतिबंध है. आज भी चीन के सरकारी मीडिया ने इस हत्याकांड की बरसी का कोई ज़िक्र नहीं किया है. चीन में तियनेनमेन से जुड़े शब्दों का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध है. वर्ष 2018 में तो चीन में मोबाइल एप्लीकेशन की मदद से एक दूसरे को 89.64 या 64.89 युआन की रकम भेजने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था, क्योंकि 89 का मतलब है वर्ष 1989 और 64 का मतलब है छठा महीना और 4 जून. यानी इशारों में भी इस घटना का जिक्र करना चीन की सरकार को पसंद नहीं है.

उस समय चीन के सुप्रीम कमांडर Deng Xiaoping थे. बाहर से वह लोकतांत्रिक सुधारों के पक्षधर थे, लेकिन उनका असली उद्धेश्य चीन में One Party System को मजबूत करना था और उन्हें विद्रोह की कोई भी आवाज पसंद नहीं थी. उस समय चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के जनरल सेक्रेटरी  हू याओबांग हुआ करते थे और वह चीन में लोकतांत्रिक सुधारों के सबसे बड़े चेहरे थे. लेकिन अक्टूबर 1987 में उन्हें उनके पद से हटा दिया गया और ज़ायो ज़ियांग को कम्युनिस्ट पार्टी का नया जनरल सेक्रेटरी बना दिया गया. इसके बाद 15 अप्रैल 1989 को हू याओबांग की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई.

चीन के छात्र उस समय हू याओबांग को उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे और उनकी अचानक हुई मृत्यु को उनके इस्तीफे से जोड़कर देखा गया. इसके बाद 17 अप्रैल 1989 को हजारों छात्र तियनेनमेन स्क्वायर पर इकट्ठा हो गए और उन्होंने वह सात सूत्रीय मांगें कम्युनिस्ट सरकार के सामने रखीं जो हू याओबांग के लोकतंत्र और आजादी से जुड़े विचारों पर आधारित थीं.

इस मसले पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में भी विवाद था, क्योंकि नए जनरल सेक्रेटरी चाहते थे कि छात्रों की बातों को सुना जाए जबकि चीन के सुप्रीम कमांडर Deng Xiaoping किसी तरह की बातचीत के पक्ष में नहीं थे.  लेकिन छात्रों से शुरू हुआ यह प्रदर्शन धीरे-धीरे बढ़ता गया और इसमें लाखों की संख्या में आम नागरिक और मजदूर भी शामिल हो गए. हालात बिगड़ते देख 20 मई 1989 को चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने मार्शल लॉ लागू कर दिया और तीन लाख सैनिकों को बीजिंग की सड़कों पर उतार दिया. 2 जून 1989 को सेना की एक गाड़ी से तीन नागरिकों की हत्या कर दी गई और यहीं से हिंसा शुरू हई और छात्रों ने चीन की सेना को रोकने के लिए सड़कों को जाम कर दिया. लेकिन चीन के क्रूर सैनिकों ने 4 और 5 जून को हजारों प्रदर्शनकारियों का खून तिनेनमेन स्क्वायर की सड़कों पर बहा दिया.

यह विडंबना है कि आज 31 वर्षों के बाद भी दुनिया के हालात नहीं बदले हैं. आज चीन में तो कोई प्रदर्शन नहीं हो रहा, लेकिन अमेरिका में अश्वेत समुदाय अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी इस प्रदर्शन को कुचलने का आरोप लग रहा है. हालांकि ट्रंप खुद चीन की तानाशाही नीतियों की आलोचना करते हैं और वह चीन पर हॉन्ग कॉन्ग में चल रहे प्रदर्शनों को क्रूरता से कुचलने का आरोप भी लगा चुके हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज से 30 वर्ष पहले अमेरिका की एक मशहूर मैगजीन प्ले ब्वॉय (Play Boy) को दिए इंटरव्यू में उन्होंने चीन के इस कदम की तारीफ की थी. उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि चीन की सरकार ने प्रदर्शनकारियों को लगभग उड़ा दिया.  उन्होंने ताकत के दम पर ऐसा किया. उस समय अपने देश की आलोचना करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि पूरी दुनिया में हमारे देश को कमजोर समझा जाता है. हालांकि जब ट्रंप राष्ट्रपति बनने की दौड़ में शामिल हुए तो उन्होंने सफाई दी थी कि उनका मतलब यह नहीं था, वह सिर्फ यह कह रहे थे कि चीन के नेता शक्तिशाली हैं.

अब बहुत सारे लोग अमेरिका में चल रहे Black Lives Matter आंदोलन की तुलना तियनेनमेन स्क्वायर आंदोलन से कर रहे हैं, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप ने भी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सेना उतारने की बात कही है. अमेरिका में यह सब तब हो रहा है जब वहां लोकतंत्र है, जबकि चीन में तो लोकतंत्र की बात करना भी गुनाह माना जाता है. यही वजह है कि आज हॉन्ग कॉन्ग के प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरकर चीन की दमनकारी नीतियों का विरोध कर रहे हैं. चीन के दबाव में हॉन्ग कॉन्ग में एक ऐसा कानून पास किया गया है जिसके तहत चीन के राष्ट्रगान का मजाक उड़ाने पर सख्त सजा हो सकती है. इसके अलावा चीन की हॉन्ग कॉन्ग के लिए एक ऐसा सुरक्षा कानून लाने की योजना है, जिसके तहत वह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रदर्शनकारियों को जेल में डालने और उन्हें कड़ी सजा देने में सक्षम हो जाएगा.

हॉन्ग कॉन्ग में हर साल तियनेनमेन स्क्वायर नरसंहार की बरसी पर शांतिपूर्वक जुलूस निकाले जाते हैं और लोग चुपचाप चीन की दमनकारी नीतियों का विरोध करते हैं. लेकिन हॉन्ग कॉन्ग  के लोगों को डर है कि वह अब शायद ही कभी ऐसा कर पाएंगे क्योंकि नया कानून लागू होने के बाद हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्तता बहुत हद तक समाप्त हो जाएगी और चीन की तरह हॉन्ग कॉन्ग में भी लोकतंत्र की बात करना लगभग असंभव हो जाएगा. इस बार हॉन्ग कॉन्ग की पुलिस ने लोगों को जुलूस या रैलियां निकालने की इजाजत नहीं दी है और इसके पीछे वजह कोरोना वायरस को बताया गया है. लेकिन इन पाबंदियों के बावजूद हॉन्ग कॉन्ग के लोग अपनी आवाज दुनिया तक पहुंचा रहे हैं.

15 अप्रैल 1989 को चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व जनरल सेक्रेटरी और उदारवादी नेता हू याओबांग की मौत हुई थी . इसके बाद 13 मई  को बीजिंग के तियनेनमेन स्क्वायर पर 100 से ज्यादा चीनी छात्र, लोकतांत्रिक सुधारों की मांग के साथ भूख हड़ताल पर बैठ गए. 19 मई को तियनेनमेन स्क्वायर पर दस लाख से ज्यादा लोगों ने कम्युनिस्ट चीन के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन किया. जिसके बाद प्रधानमंत्री ली पेंग के आदेश के बाद मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और सेना टैंकों के साथ सड़कों पर उतर आई. चीनी सेना ने लोगों पर गोलियां और बम चलाने से भी खुद को नहीं रोका. और फिर आई 3 और 4 जून 1989 की वो रात, जब चीनी सेना ने तियनेनमेन स्क्वायर पर गोलीबारी शुरू की, जिसमें हजारों नागरिकों और छात्रों को मौत के घाट उतार दिया गया. 5 जून 1989 को तियनेनमेन स्क्वायर पर मशहूर टैंकमैन वाकया हुआ. एक प्रदर्शनकारी अकेला सड़क पर टैंकों के सामने खड़ा हो गया. इस तस्वीर को चीन ने वर्षों तक प्रतिबंधित रखा. और इस तरह 31 वर्ष पहले तियनेनमेन स्क्वायर पर कम्युनिस्ट चीन के इतिहास के सबसे बड़े सरकार विरोधी आंदोलन का सबसे क्रूर अंत हुआ. आज भी चीन की सेना और सरकार इस घटना के बारे में बात करने से कतराती है.

लेकिन तीन दशक बाद भी चीन का वही लोकतंत्र विरोधी रवैया कायम है. और इस बार उसके निशाने पर हैं हॉन्ग कॉन्ग, जहां शायद इस बार आखिरी बार तियनेनमेन स्क्वायर नरसंहार में मारे गए लोगों की याद में प्रदर्शन हो रहा है. क्योंकि चीन एक नया कानून लेकर आया है, जिससे हॉन्ग कॉन्ग की स्वायत्ता खो सकती है और विशेष दर्जा खत्म हो सकता है.

हॉन्ग कॉन्ग के प्रदर्शनकारी यीउक कहते हैं कि  जो 4 जून 1989 को हुआ था, वही अब हॉन्ग-कॉन्ग में हो रहा है.  31 वर्ष पहले चीन की सरकार ने लोगों की आवाज को दबाया था, और अब ऐसी ही चीजें बहुत जल्द हॉन्ग-कॉन्ग में होंगी. अभिव्यक्ति की आजादी को दबा दिया जाएगा. सिर्फ हॉन्ग कॉन्ग ही नहीं, चीन की दमनकारी नीति का शिकार ताइवान भी है. चीन ने धमकी दी है कि वो ताइवान को कभी आजाद नहीं होने देगा फिर चाहे उसे सैन्य कार्रवाई ही क्यों ना करनी पड़े. चीन को तियनेनमेन स्क्वायर नरसंहार की याद दिलाते हुए ताइवान ने चीन से माफी की मांग की है, लेकिन चीन ने ना तो कभी अपनी गलती मानी है और ना मानेगा.

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन कहते हैं कि ताइवान ने जो टिप्पणी की है, वह बकवास है. 1980 के दशक में जो कुछ भी हुआ, चीन उस पर अपना रुख साफ कर चुका है. चीन की स्थापना के 70 वर्षों के दौरान नए चीन ने विकास की जो राह चुनी है, वह एकदम सही है और चीन के राष्ट्रीय हित में है. यानी चीन को ना तो 31 वर्ष पहले हुए तियनेनमेन स्क्वायर नरसंहार पर कोई पछतावा है और ना ही जो आज वह हॉन्ग-कॉन्ग और ताइवान के साथ कर रहा है, उस पर कोई अफसोस है ।

समय बदल चुका है, लेकिन चीन का व्यवहार नहीं बदला है. हालांकि अब चीन के लिए तियनेनमेन स्क्वायर की घटना को दोहराना आसान नहीं है. फिर भी चीन पूरी दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह अपने इरादों से पीछे हटने वाला नहीं है.  हाल ही में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी वार्षिक बैठक हुई,  जिसका विश्लेषण करने से यह साफ हो जाता है कि चीन अपनी विस्तारवाद वाली नीति को आगे बढ़ाना चाहता है ।
हॉन्ग कॉन्ग में नए सुरक्षा कानून की बात हो या फिर ताइवान को धमकी देना, या फिर दक्षिण चीन सागर को लेकर विवाद पैदा करना और सीमा पर भारत के साथ उलझना, यह सब बातें साफ करती हैं कि चीन कम्युनिज्म की विचारधारा के नाम पर सारी हदें पार करने के लिए तैयार है.

चीन एक कम्युनिस्ट देश है और वहां की सरकार तानाशाही की तर्ज पर चलती है. लेकिन आज अगर चीन तियनेनमेन स्क्वायर जैसी कोई घटना दोहराना चाहे तो यह उसके लिए आसान नहीं होगा क्योंकि 31 वर्ष बाद स्थितियां बदल चुकी हैं और तियनेनमेन स्क्वायर जैसी घटनाओं पर पर्दा डालना आसान नहीं है. आज सोशल मीडिया का दौर है और मुख्य धारा की मीडिया भी पहले से ज्यादा प्रभावी और सशक्त है. इसलिए चीन चाहकर भी हॉन्ग कॉन्ग में हो रहे प्रदर्शनों को 1989 की तर्ज पर कुचल नहीं सकता. चीन अगर ऐसा करेगा तो उसका अंतर्राष्ट्रीय बहिष्कार तय है और चीन भी यह बात अच्छी तरह जानता है. लेकिन कम्युनिस्ट चीन लोकतांत्रिक सुधार नहीं चाहता. जब 1990 के दौर में सोवियत संघ का विघटन हुआ था और कम्युनिस्ट देशों ने लोकतंत्र को अपनाना शुरू किया था तब भी चीन को यह बात पसंद नहीं आई थी.  उस समय पूरी दुनिया की राजनीति में लगातार भूकंप आ रहे थे. इसकी शुरुआत उस समय के USSR यानी सोवियत संघ ने की थी. अस्सी के दशक में सोवियत देशों ने बाहरी दुनिया के लिए अपने दरवाजे खोलने शुरू कर दिए थे और सोवियत नेता मिकायल गोरबाचोव (MIKHAIL GORBACHEV) इसकी अगुवाई कर रहे थे.

मई 1989 में मिकायल गोरबाचोव चीन की यात्रा पर गए थे . यह 30 वर्षों में रूस के किसी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा थी.  उस समय चीन के प्रदर्शनकारी मिकायल गोरबाचोव से मिलना चाहते थे, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया. लेकिन उन्होंने यह समझ लिया था कि चीन किस रास्ते पर जा रहा है. उन्होंने अपने डेलिगेशन के एक सदस्य से यह कहा था कि जो चीन के तियनेनमेन स्क्वायर पर हो रहा, वह नहीं चाहते कि वही रूस के रेड स्क्वायर (RED SQUARE) पर हो. तियनेनमेन स्क्वायर पर जो कुछ हुआ उसने गोरबाचोव के इस विश्वास को मजबूत किया कि कम्युनिस्ट देशों को अपनी शासन प्रणाली में सुधार लाना ही होगा.

आज ही के दिन पोलेंड में पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए थे. पोलेंड भी सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था. उसी वर्ष हंगरी में भी कम्युनिस्ट शासऩ का अंत हो गया था और धीरे-धीरे सोवियत संघ के कई देश लोकतंत्र की दिशा में आगे बढ़ गए. इसके फौरन बाद जर्मनी में बर्लिन की दीवार भी गिरा दी गई और सोवियत संघ टूटने लगा.  लेकिन चीन यह बिल्कुल नहीं चाहता था क्योंकि सोवियत संघ का टूटना कम्युनिस्ट विचारधारा के लिए एक बहुत बड़ा झटका था.

चीन ने सोवियत संघ का विघटन रोकने की तमाम कोशिश की, लेकिन मिकायल गोरबाचोव बदलाव के लिए प्रतिबद्ध थे और आखिरकार चीन अपनी कोशिश में असफल हो गया. चीन कम्युनिज्म की इस पराजय को कभी भुला नहीं पाया और शायद यही वजह रही कि उसने भविष्य की क्रांतियों को रोकने के लिए और सख्त रवैया अपना लिया.

1989 में राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री थे और तब टीवी प्रसारण पर सरकार का नियंत्रण था. कहा जाता है कि राजीव गांधी की सरकार ने यह कोशिश की थी तियनेनमेन स्क्वायर की घटना की तस्वीरें कम से कम दिखाई जाएं क्योंकि भारत चीन को यह इशारा देना चाहता था कि वह उसकी घरेलू समस्याओं में कभी दखलअंदाज़ी नहीं करेगा. लेकिन इसकी एक वजह और थी और वो यह थी कि इस नरसंहार से एक वर्ष पहले राजीव गांधी ने चीन का दौरा किया था. यह कई दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला चीन दौरा था. हैरानी की बात यह है कि राजीव गांधी के दौरे से कुछ समय पहले ही अरुणाचल प्रदेश के सुम दोरोंग चू में भारत और चीन सीमा विवाद में उलझे थे, ठीक वैसे ही जैसे आज लद्दाख में हो रहा है  या 2017 में डोकलाम में हुआ था. उस समय चीन ने भारत को 1962 जैसे युद्ध की धमकी भी दी थी.

इसी दौरान मई 1987 को तत्कालीन विदेश मंत्री एनडी तिवारी ने चीन का दौरा किया और संदेश दिया कि भारत इस विवाद को बढ़ाना नहीं चाहता. इसके बाद 1988 में राजीव गांधी बीजिंग गए और चीन के साथ संबंधों को सुधारने की कोशिश की और बदले में भारत ने तियनेनमेन स्क्वायर नरसंहार पर चुप्पी साध ली. लेकिन 2020 के भारत को इन घटनाओं से सबक लेकर यह सीखना चाहिए कि चीन की हर बात कबूल करना भारत के हित में नहीं है. इसलिए भारत को धीरे-धीरे चीन की वह दुखती रग दबानी चाहिए, जिससे चीन को परेशानी होती है. उदाहरण के लिए भारत को ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग के मसले पर सख्त रुख अपनाकर चीन को संदेश देना चाहिए कि उसकी दमनकारी नीतियों का समर्थन भारत किसी स्थिति में नहीं करेगा.

चीन अजेय नहीं है यह बात पूरी दुनिया को समझ आ चुकी है. चीन ने 1962 के युद्ध में भारत को हराया जरूर, लेकिन सच यह भी है कि चीन उसके बाद से खुद कभी कोई युद्ध नहीं जीता. 1979 में चीन का वियतनाम के साथ युद्ध हुआ और इस युद्ध में चीन बुरी तरह पराजित हआ और उसका काफी नुकसान भी हुआ.

इस युद्ध में चीन के करीब 28 हजार और वियतनाम में करीब 20 हजार सैनिक और नागरिक मारे गए थे. चीन ने करीब 6 लाख सैनिकों के साथ वियतनाम पर हमला किया था. चीन का उद्देश्य वियतनाम को सबक सिखाना था क्योंकि कुछ महीनों पहले ही वियतनाम ने कंबोडिया पर आक्रमण करके वहां के कम्युनिस्ट शासन को चुनौती दी थी, यही बात चीन को पसंद नहीं आई थी. चीन ने वियतनाम पर हमला तो कर दिया, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. वह युद्ध हार गया. यानी चीन ने 41 वर्ष पहले आखिरी युद्ध लड़ा था और उसमें भी वह हार गया था.

लेकिन इस दौरान भारत की सेना लगातार युद्ध लड़ती रही है और युद्ध की तैयारियां भी करती रही है. भारत की सेना को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ने की आदत है और भारतीय सैनिक इसमें माहिर भी हैं. भारत ने आखिरी बार 1999 में करगिल युद्ध लड़ा था और भारत की सेना आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ भी पूरे साल लडती रहती है. इसके अलावा पाकिस्तान और चीन की सीमा पर भी भारत की सेना हमेशा मुस्तैद रहती है और यही वजह है कि युद्ध की स्थिति में भारत की सेना खुद को जल्दी तैयार कर सकती है, जबकि चीन की सेना ने पिछले 41 वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर या अपने घर में किसी बड़ी चुनौती का सामना नहीं किया है. चीन की सेना सिर्फ अपने ही देश के लोगों का दमन करने का काम लगातार करती है, लेकिन अपने लोगों पर काबू पाने और युद्ध में दुश्मन को हराने में काफी फर्क है.

असल में चीन की सेना एक देश की नहीं बल्कि एक पार्टी की सेना है और इसलिए इसके सदस्य Army Men नहीं बल्कि Yes Men हैं, क्योंकि ये सैनिक वही करते हैं जो इनकी पार्टी इन्हें करने के लिए कहती है. जबकि भारतीय सेना भारत के लोगों के लिए आदर्श है.  यानी भारत के लोग हर परिस्थिति में अपनी सेना का साथ देते हैं और राष्ट्रवाद भारत की सेना और भारत के लोगों को आपस में जोड़ता है. जबकि चीन की सेना को चीन की जनता का उतना समर्थन हासिल नहीं है जितना भारत की सेना को है. यानी युद्ध की स्थिति में चीन के पास हथियारों और सैनिकों की तादाद भले ही ज्यादा हो, लेकिन उसकी सेना के पास राष्ट्रवाद का बल नहीं है और यही चीन की सबसे बडी कमज़ोरी है . इसके विपरीत भारत की सेना लोकतांत्रिक दायरों में काम करना जानती है और भारत के सैनिक अपने ही नागरिकों के दमन की बात कभी सोच भी नहीं सकते. अब आप समझ गए होंगे कि भारत महान क्यों है? तो देश की आलोचना कीजिए, सरकार की आलोचना कीजिए, प्रधानमंत्री की आलोचना कीजिए, मुख्यमंत्री की आलोचना कीजिए, पुलिस और प्रशासन की आलोचना कीजिए, मीडिया की भी आलोचना कीजिए, अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का जश्न मनाइये, लेकिन एक बात ध्यान रखिए कि यह आजादी लोकतंत्र की वजह से मिली है. यह एक बहुत बड़ी लग्जरी (Luxury) है जो सबको नहीं मिलती. इसलिए लोकतंत्र का सम्मान कीजिए.

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