1948 ओलंपिक में पहली बार विदेशी सरजमीं पर लहराया गया था तिरंगा, उसे जिंदगी का सबसे बेहतरीन पल मानते थे सीनियर

  • जब तिरंगा लहराया तभी खुद को आजाद महसूस किया
  • दुनियां के बेस्ट सेंटर फॉरवर्ड में शुमार थे सीनियर

दैनिक भास्कर

May 25, 2020, 10:07 AM IST

चंडीगढ़. (गौरव मरवाहा). देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ लेकिन बलबीर सिंह सीनियर के लिए आजादी का दिन 12 अगस्त, 1948 था। करीब एक साल बाद उन्होंने खुद को आजाद महसूस किया। ये वो दिन था जब भारत ने ब्रिटेन को 4-0 से हराकर ओलंपिक गोल्ड जीता था। ये दिन इसलिए खास था क्योंकि आजाद भारत का ये पहला गोल्ड था। वो लम्हा जब पहली बार भारत का तिरंगा झंडा कहीं फहराया गया। वो गर्व का पल था और उसी गर्व को बलबीर सिंह सीनियर ने हमेशा अपने अंदर संजोया रखा। उन्होंने कहा था कि उस दिन मैंने अपने आप को आजाद महसूस किया। जिस देश ने आपके उपर कई सालों तक राज किया, उसी देश को हराने के बाद, उनके सामने आपका तिरंगा लहराया जा रहा था। उस लम्हे को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। ऐसा लग रहा था कि मैं तिरंगे के साथ ही उड़ रहा हूं।

सीनियर के किस्से जो युवाओं को मोटिवेट करेंगे

बलबीर सीनियर के करियर के लाखों किस्से रहे जो युवाओं को मोटिवेट करते रहेंगे, लेकिन दुख है कि अब वो किस्से सुनाने के लिए वो नहीं रहे। बलबीर सिंह सीनियर का देहांत फोर्टिस अस्पताल में लंबी बिमारी के कारण हो गया। कुछ समय पहले 108 दिन उन्होंने पीजीआई में बिताए और वे वहां से जीत कर घर लौटे। लेकिन ये पहला मौका था कि वे हार गए। वे हारे और देश ने अपना एक बड़ा और चमकता हुआ सितारा खो दिया। वे देश के सबसे बड़े खिलाड़ी के साथ साथ दुनियां के बेस्ट सेंटर फॉरवर्ड थे, जिसका रिकॉर्ड आज भी कायम है। मॉर्डन हॉकी का कोई भी खिलाड़ी उनके रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाया है। ये रिकॉर्ड उन्होंने 1952 ओलंपिक में गोल्ड जीतकर कायम किया था। उन्होंने फाइनल में 6 में से 5 गोल मारे थे और उनका ये रिकॉर्ड आज भी गिनीज बुक में कायम है।

हमेशा हॉकी के साथ जुड़े रहे:

रिटायरमेंट के बाद बलबीर सीनियर हॉकी से अलग नहीं हो सके और उन्होंने 1971 में पहली बार भारतीय टीम के साथ काम किया। वे टीम के मैनेजर थे और पहली बार वर्ल्ड कप के लिए भेजी गई टीम के साथ उन्हें भेजा गया। भारतीय टीम ने वहां पर गोल्ड मेडल मिस किया और ब्रॉन्ज मेडल से ही टीम को संतोष करना पड़ा। इसके बाद 1975 में वर्ल्ड कप के लिए गई टीम में फिर से बलबीर सीनियर को ही मैनेजर बनाया गया। यहां पर टीम ने गोल्ड जीता और ये भारत का एकमात्र वर्ल्ड कप गोल्ड है। 1982 में नई दिल्ली में हुए एशियाई खेलों की मशाल जलाने का सम्मान भी बलबीर सिंह को दिया गया।

यंगस्टर्स के लिए भी किया काम:

बलबीर सिंह सीनियर ने यंगस्टर्स के लिए भी काफी काम किया। पंजाब स्टेट स्पोर्ट्स काउंसिल और डायरेक्टर ऑफ स्पोर्ट्स, पंजाब के सचिव के पद भी काम किया। 1992 में वे पंजाब सरकार से रिटायर हुए। 1997 में उनकी ऑटोबायोग्राफी भी पब्लिश हुई। इसका नाम ‘द गोल्डन हैटट्रिक’ था। 2008 में उनकी दूसरी बुक ‘The Golden Yardstick: In Quest of Hockey Excellence’ पब्लिश हुई। 2019 में पंजाब सरकार ने उन्हें महाराजा रणजीत सिंह अवॉर्ड से सम्मानित किया। ये पंजाब सरकार का सबसे बड़ा खेल सम्मान है। उनके लिए सर्वोच्च भारतीय सम्मान खेल रत्न की भी मांग पंजाब सरकार लगातार करती रही।

Source BHASKAR

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