संसार के लिए रोये थे कबीर, क्या समय फिर उन्हें बुला रहा है

नई दिल्ली :  कहते हैं कि जब काल यानी समय को जरूरत होती है तो वह महात्माओं को धरती पर लाता है.  उनके संदेशों को जरिये समाज को नई दिशा मिलती है. कबीर दास जी का भी जन्म इस समाज की कुरीतियों पर कड़ा प्रहार करने और सामाजिक समरसता के लिए हुआ था.

कबीर दास जी के अनुयायी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को उनका जन्म मानते हैं. और आज वही ऐतिहासिक तिथि है. कबीर दास जी पढे़-लिखे तो नहीं थे, लेकिन उन्होंने जो कहा वह अमृत के समान है. उनके अमृत वाक्य साखी, शबद और रमैनी के रूप में सामने आए। कबीर दास के समय में सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल हो रही थी. उस समय सिकंदर लोदी का शासन था. डॉ. रामचंद्र तिवारी अपनी पुस्तक कबीर मीमांसा में उल्लेख करते हैं कि जिस समय कबीर काशी में बैठे-बैठे धार्मिक और सामाजिक आडंबरों का खंडन कर रहे थे, उस समय दिल्ली में सिकंदर लोदी शासन कर रहा था. वह कट्टर और शक्तिशाली शासक था. उसका सारा जीवन युद्धों में ही बीता. सामान्य जनता में राजनीतिक चेतना का अभाव था. 

ऐसा कहा जाता है कि सिकंदर लोदी ने कबीर दास जी को काफी परेशान भी किया था. लेकिन कबीर दास जी इससे विचलित नहीं हुए और समाज को नई दिशा देते रहे. कबीर के समय में सबसे ज्यादा उथल-पुथल सामाजिक जीवन में थी.  उन्होंने धार्मिक बाह्य आडंबरों, जातिप्रथा पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने जो कुछ बुरा देखा, उसे पूरी दृढ़ता के साथ कहा। वह भाषा के बंधन में नहीं बंधे। ऐसी बातें सरल शब्दों में कहीं जो सीधे दिल तक पहुंचती थीं। कबीर दास जी कहते हैं-

सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।।

डॉ. श्याम सुंदर दास अपनी पुस्तक कबीर ग्रंथावली में लिखते हैं कि कबीर का यह दुख अपने लिए नहीं है, वह अपने लिए नहीं रोते,  संसार के लिए रोते हैं. क्योंकि उन्होंने साई के सब जीवों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था. संसार के लिए ईसा मसीह की तरह उन्होंने अपने आपको मिटा दिया था.  यानी उन्हें संसार के हर प्राणी की चिंता थी.  वह निर्मल हृदय और प्रेम को महत्व देते थे। कबीर के समय युगीन परिस्थितियां ऐसी थीं कि जनता कराह रही थी. ऊंच-नीच, छुआछूत आदि कुरीतियों को प्रेम के जरिए ही समाप्त किया जा सकता था. और कबीर दास जी यह बात अच्छी तरह से जानते थे। इसीलिए उन्होंने प्रेम को सबसे ऊपर रखा. उन्होंने कहा भी है-
सतगुर हम सूं रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।
बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग।।

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरष्या आइ।
अंतरि भीगी आत्मा, हरी भरी बनराई।।

सिकंदर लोदी जैसे कट्टर शासक का समय भी कबीर दास जी को विचलित नहीं कर सका. उन्होंने काशी में रहकर हिंदू और इस्लाम दोनों धर्मों में व्याप्त आडंबरों का खुलकर विरोध किया. उन्होंने पढ़कर नहीं, अपने को तपाकर यानी तपस्या कर ब्रह्म को जाना था. उन्होंने बता दिया था कि आत्मा और ब्रह्म एक ही है. उन्हें अपने ब्रह्म पर इतना विश्वास था कि उन्होंने यह कहकर मृत्यु को चुनौती दे दी थी-

हम ना मरैं मरिहै संसारा, हम कूं मिल्या जियावनहारा।

आज के समय में भी प्रेम की जरूरत है. प्रेम आदमी को मानव बनाता है. उसके हृदय में संवेदना भरता है. केरल में गर्भवती हथिनी की हत्या करने वाले यदि कबीर की कही बातों को सुन लिए होते, कबीर की बातों को जीवन में उतार लिए होते तो हत्या जैसा घृणित कार्य नहीं करते. क्या फिर ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं कि समय कबीर को बुला रहा है.

 

 

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