तो ऐसे विनायक दामोदर सावरकर के नाम के आगे लग गया था ‘वीर’

नई दिल्ली: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान क्रांतिकारियों में से एक विद्वान, अधिवक्ता और लेखक विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) का नाम बड़े गर्व और सम्मान के साथ लिया जाता है. सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) को ‘वीर’ सावरकर के नाम से बुलाया जाता है. लेकिन क्या आज जानते हैं कि उनके नाम के आगे आखिर कैसे ‘वीर’ शब्द या उपाधि किस तरह से जुड़ी?

सावरकर के ‘वीर’ उपाधि से जुड़ी एक कहानी है. इस कहानी में कई दिलचस्प किस्से छिपे हुए हैं. दरअसल जिस कलाकार ने सावरकर को ‘वीर’ की उपाधि दी, उस कलाकार को सावरकर भी ‘आचार्य’ कहकर बुलाते थे. दोनों के नामों के उपाधि इस तरह से लोकप्रिय हुई कि लोग उनकी उपाधि के बगैर नाम ही नहीं लेते.

जानिए कैसे मिली वीर की उपाधि?
दरअसल, कांग्रेस के साथ एक बयान को लेकर विवाद होने के बाद सावरकर को पार्टी ने ब्लैकलिस्ट कर दिया था. सावरकर का हर जगह विरोध किया जाता था. इस कठिन वक्त में नाटक और फिल्म कलाकार पीके अत्रे ने सावरकर का साथ देने का फैसला किया.

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अत्रे ने पुणे में अपने बालमोहन थिएटर में सावरकर के लिए एक स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया. इस कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सावरकर के खिलाफ पर्चे बांटने के साथ ही काले झंडे दिखाने की धमकी दी. हालांकि इस विरोध के बाद भी हजारों लोग कार्यक्रम में जुटे और सावरकर का स्वागत कार्यक्रम हुआ. इस कार्यक्रम में ही अत्रे ने सावरकर को ‘वीर’ की उपाधि दी, जो आज तक चर्चित है.

कांग्रेसी कार्यकर्ता सावरकर के विरोध में बाहर हंगामा कर रहे थे और अत्रे ने स्वागत कार्यक्रम में भाषण में सावरकर को निडर बताते हुए कहा था कि काले झंडों से वो आदमी नहीं डरेगा, जो काला पानी की सजा तक से नहीं डरा. इस दौरान अत्रे ने सावरकर को उपाधि दी ‘स्वातंत्र्यवीर’. यही उपाधि बाद में सिर्फ ‘वीर’ हो गई और सावरकर के नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ गई.

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